सुलग रही चिंगारी
पंकज दास
सरकार ने मधेशी मोर्चा और माओवादी के बीच हुए चार सूत्रीय समझौते के तहत मधेशी युवाओं का नेपाली सेना में सामूहिक प्रवेश कराने और मधेशी का अलग से बटालियन बनाने का फैसला मंत्रिपरिषद से किया था। वैसे तो इस फैसले पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी। क्योंकि नेपाली सेना को समावेशी बनाए जाने के लिए दलों के बीच माओवादी और मधेशी दलों के बीच यह कोई पहली बार हुआ समझौता नहीं है। इससे पहले भी वृहत शान्ति समझौता के भाग ४ के दफा ७ में भी सेना को समावेशीकरण करने की बात उल्लेख थी। इतना ही नहीं नेपाल के अन्तरिम संविधान २०६३ की धारा १४४ के उपधारा ३ और ४ में भी नेपाली सेना को समावेशी बनाने की बात उल्लेख है।इसके अलावा मधेश आन्दोलन के बाद जितने भी समझौते हुए हैं चाहे वह पहले मधेश आन्दोलन के बाद मधेशी जन अधिकार फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव और नेपाल सरकार के बीच हुए २२ सूत्रीय समझौता हो या फिर दूसरे मधेश आन्दोलन के बाद संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा और तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा कोइराला और तीनों प्रमुख दल के बीच हुआ ८ सूत्रीय समझौता हो सभी में नेपाली सेना को समावेशी करने की बात और मधेशी समुदाय को नेपाली सेना में सामूहिक प्रवेश की बात दर्ज है। इस समझौता में तो कांग्रेस एमाले और माओवादी के पार्टर्ीी्रमुखों का भी हस्ताक्षर है।
यह सब होने के बावजूद आखिर जब सरकार ने इन समझौतों का कार्यान्वयन किया तो फिर इतना बवाल नहीं मचना चाहिए था। आखिर नेपाली सेना को समावेशी बनाने की बात तो सभी करते हैं। सभी चाहते हैं कि नेपाली सेना में देश के हर हिस्से और हर तबके के लोगों को उचित स्थान मिले। लेकिन जब इसके कार्यान्वयन की बात आती है तो सबसे अधिक तीन बडे दलों के नेताओं का सिर्रदर्द होने लगता है।
कहने के लिए तो नेपाली कांग्रेस एमाले और माओवादी खुद को इस देश की बडी पार्टियां होने का दावा करती है लेकिन वास्तव में बडी पार्टर्ीीोने के बावजूद मधेश के सवाल पर मधेशी जनता को अधिकार दिए जाने के सवाल पर मधेशी जनता को उचित सम्मान दिए जाने के सवाल पर इन तीनों दलों का दिल काफी छोटा है।
मधेशी जनता को नेपाली सेना में भर्ती किए जाने के सरकार के फैसले पर माओवादी का वैद्य समूह,नेपाली कांग्रेस और एमाले के नेताओं को इससे राष्ट्रीयता पर खतरा नजर आने लगा है। मधेशी युवाओं को सेना में प्रवेश दिया गया तो देश की अखण्डता पर खतरा होने की धारणा कांग्रेस और एमाले के नेताओं ने व्यक्त की है। मधेशी युवाओं के सेना में जाने से सेना का आन्तरिक अनुशासन और एकता भी भंग हो सकती है।
यह सब आरोप कोई राजनीति से प्रेरित नहीं है बल्कि एक सोची समझी रणनीति के तहत लगा जा रहा है। कांग्रेस और एमाले के नेता सहित मधेशी युवाओं के राष्ट्रीय सेना में प्रवेश करने के फैसले का विरोध करने वाली तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग और नागरिक समाज तथा नेपाल की कथित राष्ट्रीय मीडिया मधेशी जनता को नेपाल का नागरिक समझने के लिए तैयार नहीं है। मधेशी विरोधी नेता हो या अधिकारी मानवाधिकार से जुडा आदमी हो या पत्रकार अगर वो सेना में मधेशी जनता के प्रवेश का विरोध करती है तो यकीन मानिए कि ये सभी एक साथ मिलकर एक षडयंत्र के तहत पूरी दुनिया को यह दिखाना और बताना चाहते हैं कि मधेशी जनता नेपाल का नागरिक है ही नहीं। मधेशी जनता विदेशी नागरिक है। चूंकि विदेशी जनता को ही सेना जैसे संवेदनशील अंगों में भर्ती नहीं दिया जाता है। इसलिए मधेशी के सामूहिक प्रवेश पर देश की राष्ट्रीयता और अखण्डता खतरे में पड सकती है क्योंकि इस देश की बडी पार्टियां और बडे मीडिया घराना मधेशी को विदेशी बनाने पर तुले हुए हैं।
मधेशी जनता उन नेताओं से उन बुद्धिजीवियों से उन पत्रकारों से यह सवाल पूछना चाहती है कि आखिर मधेशी जनता के ही नेपाली सेना में सामूहिक प्रवेश से आपको क्यों ऐतराज है-आखिर मधेशी जनता को भी इस देश में उचित और सम्मानजनक स्थान दिया जाता है तो इससे किस तरह से देश की अखण्डाता और राष्ट्रीयता खतरे में पड जाएगी-जब नेपाली सेना में पहाड के जनजाति आदिवासी दलित और उच्च जातियों के अलग बटालियन बनने से सेना की अनुशासन और एकता भंग नहीं हर्ुइ तो मधेशी जनता के ही बटालियन बनने से आखिर क्यों एकता अनुशासन राष्ट्रीयता और अखण्डता पर आंच आ सकता है- इसका जवाब वो नहीं दे पाएंगे क्योंकि इसका उनके पास कोई जवाब नहीं होगा।
मधेशी जनता के हित में ना तो इस देश की व्यवस्थापिका है ना कार्यपालिका है और ना ही न्यायपालिका। जैसे तैसे मधेशी मोर्चा के दबाब में मंत्रिपरिषद ने मधेशी सेना के सामूहिक प्रवेश के फैसले को अंजाम देती है तो तुरन्त ही सत्तारूढ पार्टियां जो कि खुद को र्सवहारा और मुक्तिकामी, शोषित पीडित जनता के हित में आवाज उठाने का दम्भ भरती है उसके ही कई बडे नेता इसका विरोध करते हैं। विपक्ष में बैठी नेपाली कांग्रेस और एमाले जिनको तर्राई के ही लोगों ने अधिक वोट देकर संसद तक भेजा है वही पार्टर्ीीाज मधेशी जनता को अराष्ट्रीय बताने पर तुली हर्ुइ है। कांग्रेस और एमाले के नेता शायद इस बात को भूल गए हैं कि पूरे देश से माओवादियों ने इन दोनों पार्टियों का सुपडा साफ कर दिया था तब मधेशी जनता ने ही इनकी इज्जत बचाई थी। मधेश के जिलों से ही मिले वोट की वजह से कांग्रेस और एमाले आज अपने आप को दूसरी और तीसरी बडी पार्टर्ीीहते हुए इस देश का ठेकेदार बनी फिरती है। और जब मधेशी को अधिकार देने का समय आया तो सबसे पहले इन्ही पार्टर्ीीे लोग विरोध कर रहे हैं। ये तो हर्ुइ राजनीतिक दलों की बात।
कहने के लिए तो यह मधेशी मोर्चा के र्समर्थन से टिकी सरकार है लेकिन इस सरकार में मधेशी मंत्रियों के साथ भी भेदभाव किया गया है। शरद सिंह भण्डारी को मधेशी के र्समर्थन में ही बोलने पर रक्षा मंत्री पद से हटाया जा चुका है। प्रभु साह को मधेशी होने के कारण ही हत्या का आरोप लगा कर बिना अदालत के फैसले से हटा दिया गया। कार्यपालिका का प्रमुख अंग होता है प्रशासन। और यहां का प्रशासन भी मधेशी विरोधी लोगों से भरा पडा है। मधेशी मंत्रियों द्वारा किए गए फैसलों और उनके निर्देशों का पालन नहीं होता है। सरकार के कई सचिव मंत्रियों को सिर्फइसलिए नहीं भाव देते क्योंकि वो मधेशी होते हैं।
अब बात करते हैं व्यवस्थापिका संसद की। संसद में भी मधेशी दल और सभासदों के साथ भेदभाव किया जाता है। संसद में सबसे अधिक विभेदकारी नीति अपनाने वाले हैं सभामुख सुवास चन्द्र नेम्बांग। मधेश विरोध तो इनमें कूट कूट कर भरा हुआ है। मधेशी सभासदों को बोलने के लिए ना देना,मधेशी दलों के आग्रह की उपेक्षा करना मधेशी दल में आने वाले विभाजन को हवा देना तो जैसे इनके रूटीन में है। संसद और सभामुख के अलावा संसदीय समिति भी मधेशी विरोधी ही हैं। मधेशी मंत्रियों के कामों पर हमेशा टीका टिप्पणी करना रोजमर्रर्ााी बात हो गई है।
इस देश की न्यायपालिका भी मधेश विरोधी मानसिकता से ग्रसित दिखाई पडती है। बात दाउरा सुरूवाल को राष्ट्रीय पोशाक का दर्जा देने की हो या मधेशी दलों के संबंध में। इस समय मधेशी जनता को नेपाली सेना में भर्ती के लिए सरकार द्वारा किए गए फैसले पर अन्तरिम रोक लगाने के लिए र्सवाेच्च अदालत ने आदेश दिया है। अब न्यायालय के प्रति भी मधेशी जनता का विश्वास उठ रहा है। जब माओवादी लडाकुओं के सेना में सामूहिक समायोजन की रिट दायर की जाती है तो र्सवाेच्च अदालत उस रिट को खारिज कर देती है। लेकिन जब बात मधेशी जनता की हो तो रिट पर सुनवाई ही नहीं होती है बलि्क उसे रोकने के लिए अन्तरिम आदेश जारी कर देती है। मधेशी मंत्रियों द्वारा किए गए किसी भी राजनीतिक नियुक्ति के विरोध में तुरन्त अन्तरिम आदेश जारी कर दिया जाता है।
बात बात पर मधेशी जनता को अपनी राष्ट्रीयता और देश प्रेम के बारे में अपना जवाब देना पडता है। बात बात पर मधेशी समुदाय को नेपाली नहीं होने का अहसास दिलाया जाता है। बार बार मधेशी जनता को इस देश का नागरिक नहीं होने की याद दिलाई जाती है। बार बार मधेशी जनता के साथ ही नहीं मधेशी नेताओं के साथ भेदभाव किया जाता है। २१वीं सदी जहां पूरी दुनिया अब जातीयता और क्षेत्रीयता से काफी ऊपर उठती जा रही है ऐसे में नेपाल के मधेशी विरोधी शासक वर्ग, सरकार, राजनेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार, नागरिक समाज आज भी क्षेत्रीयता के नाम पर रंगभेद कर रहे हैं जो कि कानूनन अपराध है।
सेना में सामूहिक प्रवेश की बात पर जिस तरह से देश में उसका विरोध किया गया उससे एक बात तो तय है कि मधेशी जनता में इस बात का एहसास दिलाया जा रहा है कि उन्हें सेना में सामूहिक प्रवेश नहीं दिया जाएगा। मधेशी जनता इस देश के नागरिक नहीं हैं उन्हें बार बार यह याद दिलाया जा रहा है। इस देश की सेना में उनके लिए कोई स्थान नहीं है इस बात को समझाया जा रहा है। मधेशी जनता में देश के प्रति कोई भी राष्ट्रीयता नहीं है और मधेशी जनता इस देश की अखण्डता के लिए खतरे के रूप में है इस बात को जोर शोर से प्रचारित और प्रसारित किया जाता है।
जब से सेना में मधेशी के सामूहिक प्रवेश की बात की जा रही है तभी से ही देश के कुछ स्वनाम धन्य लेखक इस बात को लगातार अपने लेखों में स्थान दे रहे हैं कि स्वभाव से ही मधेशी कायर और बुजदिल होते हैं इसलिए नेपाली सेना में उन्हें स्थान नहीं दिया जाता है। एक वामपंथी लेखक ने तो यहां तक कहा है कि काला रंग और वंशानुगत कायर स्वभाव के होने की वजह से मधेशी जनता को भारतीय सेना में भर्ती नहीं किया जाता है। एक दूसरे लेखक जो कि सेना के ही एक रिटायर्ड अधिकारी हैं उनका कहना भी कुछ ऐसा ही है। इस सेना के पर्ूव अधिकारी ने कहा है कि मधेशी के सेना में सामूहिक प्रवेश पर बिना वजह बवाल मचाया जा रहा है। सरकार के इस फैसले से कुछ भी र्फक नहीं पडने वाला है क्योंकि मधेशी जनता में सेना के प्रति ना तो आकर्षा है और ना ही उनमें वो ताकत और जज्बा कि सेना में भर्ती हो सके। मतलब साफ है। मधेशी जनता को नीचा दिखाने के लिए सामाजिक तौर पर भी हमला शुरू हो गया है। और इन दो लेखकों के कलम से जो निकला है वह भी मधेशी जनता के साथ होने वाले भेदभाव का ही एक नमूना है।
इस बार मधेशी जनता को भी दिखाना होगा कि वो कायर नहीं है। यह गाली सिर्फहमारे समुदाय पर ही नहीं बलि्क हमारे वंश को ही दी गई है। और इसका मूंहतोड जवाब देना ही होगा। मधेशी को अधिक से अधिक सेना में भर्ती होकर यह दिखाना होगा कि कि हम हर्रर् इंट का जवाब पत्थर से देना जानते हैं।
मधेशी जनता पर विखण्डनवाद का आरोप लगाने वाले नेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों की असलियत यह है कि वह जानबूझकर ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं इस तरह का भाषण देते हैं और इस तरह कलम चलाते हैं कि जिससे मधेशी जनता अपने आप को इस देश का नागरिक नहीं समझने पर मजबूर हो रहा है। मधेशी जनता को उसके नैर्सर्गिक अधिकारों तक से वंचित किए जाने से अब यह बात मन में बैठने लगी है कि इस देश में उन्हें कोई भी अधिकार नहीं दिया जाएगा। मधेशी जनता के मन में बिखण्डन के बीज जानबूझकर रोपे जा रहे हैं। ताकि मजबूर होकर मधेशी जनता अपनी स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाए। जब किसी देश के बडे समुदाय पर देश की आधी आबादी वाले लोगों की पहचान मिटाने की साजिश की जाती है और जब देश की आधी आबादी के लोगों को उसके जीने के अधिकारों को भी छीनने की साजिश की जाती है, जब देश की आधी आबादी के लोगों को उस देश का नागरिक ही नहीं समझा जाता है तो यकीन मानिए उस देश के शासक और शोषक की हालत मुअम्मर गद्दाफी जैसी होती है।
अरब देशों में इस समय चल रहे परिवर्तन की आंधी इस देश में भी असर कर सकता है। मधेशी जनता को इस देश से बाहर करने का सपना देखने वालों को यह बहुत महंगा पड सकता है। मधेशी के मन में जो चिंगारी भडक रही है उसे हवा देने का काम करने वालों को खबरदार करना चाहता हूं। यदि यह चिंगारी इस बार शोला बनकर भडÞकी तो खनाल, कोइराला, पौडेल, पोखरेल जिसे इस युग के आस्तीन के तानाशाहों का नामो निशां तक मिट जाएगा।
भलाई इसी में है कि नेपाली सेना में मधेशी समुदाय के सामूहिक प्रवेश की प्रक्रिया को बेरोकटोक आगे बढने दिया जाए। मधेशी जनता को भी इस देश के अन्य नागरिकों के तरह उचित सम्मान और स्थान दिया जाए। मधेशी जनता को भी उसके नैर्सर्गिक अधिकार से लैस किया जाए। मधेशी जनता को इस देश का नागरिक समझा जाए। जिस दिन इस देश के विकृत मानसिकता के शासक, राजनीतिक वर्ग और पत्रकार मधेशी को भी अपना बनाने में नहीं हिचकेंगे और मधेशी जनता के अधिकारों को दिए जाने वाले समान अधिकार पर बेवजह बवाल नहीं खडÞा करेंगे। यकीन मानिए उसी दिन से इस देश की अखण्डता को कोई भी खतरा नहीं रहेगा। और इस देश की राष्ट्रीयता भी मजबूत होगी।
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