संपादकीय
कुछ दिनों से हमारे देश में राष्ट्रपतीय या प्रधानमन्त्रीय शासन पद्धति के सर्न्दर्भ में जोर शोर से बहस चलती रही है हमें पता होनी चाहिए। जो भी शासन हो, किसी भी शासन में सर्वोच्च पद पर आसीन हो। अधिकार शक्ति सम्पन्न होगा तो वह व्यक्ति व्यक्ति शक्ति सम्पन्न सत्ता को राजा महेन्द्र जैसे स्वेच्छाचारी रुप में प्रयोग नहीं करेगा, ऐसी सोच रखना मर्ूखता होगी। कारण २१वीं शताब्दी में आने के बाद भी अधिकांश नेपाली जनता अभाव, अशिक्षा, बेरोजगारी और असमान अधिकार प्राप्ति की मार से पीडिÞत हो परमुखापेक्षी हो जीविन जीने को बाध्य है। संविधान सभा और शान्ति प्रक्रिया दिशाहीन हो गन्तव्यविहीन होती दीख रही है।
आज नेपाल एकात्मक शासन प्रणाली से संघात्मक शासन प्रणाली की ओर उन्मुख है। संघीयता इस देश का निर्विकल्प हो सकता है। यदि सभी राजनीतिज्ञों में अपने देश और समाज के प्रति दूरदर्शी सोच ‘र्सर्वे भवन्तु सुखिनः र्सर्वे सन्तु निरामया’ को इच्छा शक्ति आ जाय तो यह असम्भव नहीं है। पर ऐसा होता नहीं दीखता। आज तक लगभग ४ वर्षवाद भी सांसदों में संघीयता और राज्य संरचना के स्वरुप पर भी मतैक्यता नहीं हो पाई है। यह दोनों अभी भी गम्भीर एवं दुरूह प्रश्न बने हुए हैं।
२०६२/०६३ के जनआन्दोलन और मधेश में स्वतस्फर्ूत मधेशवादी आन्दोलन से नेपाल देश में आंशिक रुप में व्यवस्था अवश्य बदली पर राजकीय संरचना की नीति और चरित्र में अपेक्षित परिवर्तन नहीं हो पाया है। राजकीय पर्ुनर्संरचना का सवाल आज भी वैसे भी मुँह बाये खडÞा है। जातीय आधार पर राज्य बनाने की सोच आत्मघाती सिद्ध होगा। आत्मघाती सोच से बचने के लिए आयोग का गठन निष्पक्ष व्यक्तियों को चयन करके होना चाहिए, जो विगत मंे गठित आयोग में नहीं दिखता। सरकार द्वारा गठित राज्य पर्ुनर्संरचना आयोग सब को सन्तुष्ट नहीं कर सकता है क्योंकि इस में समाविष्ट व्यक्ति पार्टर्ीी पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। ऐसे लोग पार्टर्ीी भूमिका ही निर्वाह करेंगे । ऐसे में निष्पक्ष आयोग की हपरिहार्यता अपेक्षित है ।
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